Tuesday, 27 October 2015

कैमरे कुछ बोलते नहीं ।

यह जगह सोलन शहर में कोटला नाला है । यहाँ चक्रदोल (roundabout) के खम्बे में लगे सर्वैलंस कैमरें हमें उसी तरह सफाई करते हुए देखते रहतें हैं, जिस तरह से वे हर रोज़ खुले में कचरा फैंकने वालों को देखते हैं । कैमरे बस चुपचाप देखते हैं, कुछ बोलते नहीं । शायद ये जानते हैं कि सोलन में ही नहीं, अधिकतर भारत में खुले में गंदगी फैलाना कानूनी जुर्म नहीं हैं, ये बोलेंगें भी तो क्या ?
ये कैमरें निःशब्द हैरान हैं कि सोलन की नगर पालिका से लेकर खबर पालिका तक, कोई भी सफाई जैसे अति महत्व के विषय को क्यों अपनी प्राथमिकताओं की सूची में शामिल तक नहीं करना चाहते हैं ?

माननीय पी एम ओ कार्यालय भारत



माननीय पी एम ओ भारत,                                   शिक्षा-क्रांति :19.10.2015

यह एक राष्ट्रीय महत्व का विषय है कि माननीय प्रधानमन्त्री कार्यालय शिक्षा-क्रांति के सामाजिक-सौदेश्यता का निरंतर संज्ञान ले रहा है l गौतलब है कि शिक्षा-क्रांति देश के उन आम किंतु जागरूक नागरिकों द्वारा संचालित एक ऐसी सामाजिक संस्था है, जिसका मूल उददेश्य देश में स्वच्छता के मूल्य को लोक प्रतिष्ठित करना है l देश में व्याप्त गंदगी (कचरा और भ्रष्टाचार) के चलते, यह संस्था अभी तक अपने मूल-लक्ष्य की प्राप्ति के लिए वांछित धन (grant-in-aid) के रूप में एक नया पैसा भी कहीं से जुटा नहीं पाई है; और तो और, एक लंबे अरसे से संस्था के पुनीत कार्यों को अनदेखा और विचारों को खुलेआम अनसुना किया गया है l अतः ऐसे में यदि देश का सर्वोच्च सरकारी प्रतिष्ठान शिक्षा-क्रांति संस्था की बातों पर महज़ गौर फरमायें, तो क्या यह अपनेआप में एक विस्मयकारी घटना नहीं है ?
जब एक देश के नागरिकों को अपने नेताओं को चुनने की सम्पूर्ण आजादी मिलती है, तो उस देश में लोकतंत्र की मूल भावना का जन्म होता है l जब देश के आम नागरिकों को अपने नेताओं से संवाद स्थापित करने के अवसर प्राप्त होते हैं, तो उस देश में लोकतंत्र को जुबान मिलती है l और जब देश के नेताओं की जीवन-शैली जनता के रहन-सहन एवं आचार-विचार से मेल खाती हो, तो देश में एक प्रौढ़ एवं समता मूलक लोकतंत्र की पुष्टि होती है l

किसी भी लोकतंत्र की मजबूती के लिए यह एक अत्यावश्यक शर्त है कि इसका नेतृत्व करते शीर्ष के लोग राष्ट्र-हित को अपने संस्थागत स्वार्थ से उपर रखें l मुझे नहीं मालुम कि भारत-लोकतंत्र के राज़ नेता, समाज नेता, ‘धर्म’ नेता, धन नेता, मिडिया नेता और कला नेता समाज और प्रकृति के प्रति अपने कर्तव्यों का पालन कर रहे हैं या नहीं l लेकिन मेरा समाज सेवा का एक दशक का अनुभव कहता है कि हमारे इन नेताओं से अपने राष्ट्रीय कर्तव्यों के पालन में कहीं न कहीं गहरी भूलें होती जा रही है l कहीं इनका संचालन-कौशल मोर्चा खा रहा है, तो कहीं इनका स्वार्थ आड़े आ रहा है l इन्हीं नेतृत्व मूलक भूलों का परिणाम है कि आज हमारे देश में सार्वजनिक जीवन का अवमूल्यन तेज़ी से हो रहा है l देश से गरीबी और गंदगी (कचरा और भ्रष्टाचार) जाने का नाम ही नहीं ले रहे हैं l

हमारे देश के धन-नेता देश से गरीबी और गंदगी मिटाने की अपनी अपार क्षमता को या तो पहचान नहीं रहे हैं या पहचानना नहीं चाहते l अमीरी केवल एक स्वच्छ और समृद्ध देश के वातावरण में ही लंबे समय तक फल-फूल सकती है l अमीरी गंदगी और गरीबी के दुष्प्रभाव से ज्यादा देर तक नहीं  बच सकती l गरीबी की चीत्कारें अमीरी को चैन से सोने नहीं देगी और गंदगी की विषाणु-युक्त-हवा उसके (अमीरों के) ड्राइंग रूम तक देर-सवेर पहुँच ही जायेगी l धन नेताओं को आत्म अवलोकन करना चाहिए कि धन इकठ्ठा करने के लिए वे जिस समाज के human resources का प्रयोग कर रहे हैं और जिस प्रकृति के natural resouces का उपभोग कर रहे हैं; उसके बदले वे उस समाज और प्रकृति को क्या दे रहे है ? गरीबी और गंदगी l

देश में अमीरी और गरीबी के बीच बढ़ती खाई दिन-प्रति-दिन कितनी चौड़ी होती जा रही है, इसका अंदाज़ा एक ताज़ा रिपोर्ट से लगाया जा सकता है; “वर्ष 2000-15 के बीच भारत में 2.284 खरब डॉलर धन पैदा हुआ, जिसका 61 प्रतिशत हिस्सा सर्वोच्च एक प्रतिशत जनता के पास चला गया l टॉप 10 प्रतिशत आबादी के पास कुल उत्पन्न राष्ट्रीय धन का 81 प्रतिशत भाग गया l” क्या आने वाले 15 वर्षों में भारत के 10% लोगों के पास 100% धन इकट्ठा होगा ? क्या इस आर्थिक गैर-बराबरी की खाई के चौड़े होने से देश से गरीबी और गंदगी कम हो सकती है ? असंभव l  

देश के कॉर्पोरेट वर्ल्ड में यदि सामाजिक सौदेश्यता की भावना जीवंत हो जाए, तो वह देश से गंदगी और गरीबी खत्म करने में अपनी अग्रिणी भूमिका निभा सकता है l निःसंदेह इस कार्य सिद्धि में राजनैतिक इच्छा शक्ति की तो निहायत आवश्यकता है l

हमारे देश में कॉर्पोरेट हाउसेस बड़े-बड़े बुधिजीवी चला रहे है, अतः देश कैसे स्वच्छ और समृद्ध हो, इसके तरीकों को खोजना उनके लिए कोई बड़ी बात नहीं हो सकती, यदि वे चाहे तो l
माननीय प्रधानमंत्री कार्यालय, हम यहाँ एक छोटा सा सुझाव आपके विचारार्थ पेश करना चाहते है l आशा करते हैं कि आप इस विचार को आगे संशोधित और परिमार्जित कर, इसे अखिल भारतीय स्वरूप अवश्य देंगें l

सबसे पहले देश में ऐसा सख्त क़ानून बनें, जो हिन्दुस्तान की उन सभी कम्पनियों की (जो packeged food और beverages जैसे Lays, Uncle Chips, kurkure, mango maza, Coke, Pepsi आदि बनाती है) प्रकृति और समाज के प्रति ज़िम्मेदारी सुनिश्चित करें l इन कम्पनियों से  Corporate Social Responsibilty के तहत हर वर्ष जितना धन इकट्ठा किया जाता है, उसे इमानदारी और सटीकता से भारत को स्वच्छ बनानें में ही लगाया जाए l उस धन राशी से हिन्दुस्तान के प्रत्येक शहर में अच्छी गुणवता के Waste management plants स्थापित किये जाए l विशेषकर प्लास्टिक रैपरज़ और डिस्पोज़ेब्ल बोतले, ग्लास, चमच्च और कप को ठिकाने लगाने के लिए प्रत्येक शहर में कम से कम एक रिसाइक्लिंग प्लांट स्थापित किया जाए l इससे वातावरण के हर रोज़ होने वाले कबाड़े में जरूर कमी आएगी, ऐसा हमारा पूर्ण विश्वास है l इस कार्य-सिद्धि के लिए यह आवश्यक है कि सबसे पहले कचरे को मूल्यवान बनाने के लिए ठोस कदम उठाए जायें l उदाहरणार्थ क्या यह संभव है कि चिप्स, कुरकुरे, लेज़, माज़ा आदि के वेस्ट रैपरों और डिस्पोजेबल को दुकानदार पांच-दस रूपये प्रति कि. ग्रा. वापिस खरीदें या इसे खरीदे जाने का एक जगह प्रावधान हो ? क्या इस तरह एकत्रित किए जाने पर वेस्ट मटेरियल को नियमित तौर से नजदीकी रीसाइक्लिंग प्लांट्स भिज़वा दिये जाने की व्यवस्था नहीं हो सकती?

देश में शिक्षा-क्रांति की तरह असंख्य ऐसी सामाजिक संस्थाएं हैं, जो वर्षों से स्वच्छता के कार्य में तो लगी हैं, लेकिन उनकी कहीं कोई पूछ नहीं है l स्वच्छता के नाम से जो ‘उपर वालों’ से प्रतिवर्ष करोड़ो रूपये आते है, उस धन की भ्रष्टाचार के दानव से रक्षा कर, सटीकता से केवल स्वच्छता के कार्य में ही लगाया जाना चाहिए l इसमें दो राय नहीं है कि यदि इस विचार पर मंथन हो तथा इसका स्वच्छ रूप से देश में क्रियान्वयन हो, तो इस योजना से न केवल भारत स्वच्छता की ओर आगे बड़ेगा, बल्कि अनेकों सामाजिक संस्थाओं के लाखों स्वयंसेवकों के लिए रोज़गार के अवसर भी पैदा होंगें l ऐसा केवल मेरा ही मानना नहीं, बल्कि देश के अनेकों जागरूक नागरिकों का भी यही एकमत है, जिनसे इन दिनों शिक्षा-क्रांति संस्था अनेकों सार्वज़निक स्थानों जैसे रेलवे स्टेशन, बस स्टैंड, मार्किटों, स्कूलों, कॉलेजों और युनिवर्सिटीज़ आदि में निरंतर रूबरू हो रही है l      धन्यवाद l      आपका आभारी— सत्यन  
शिक्षा-क्रांति c/o Satyan school of Languages, near PG College, Solan. www.gesm.in , 01792-324020, 98170-61520.


Monday, 5 October 2015

सोलन रेलवे स्टेशन से बरोग रेलवे स्टेशन तक स्वच्छताग्रह अभियान ।

आज का दिन शिक्षा क्रांति के जीवन का यह एक स्मरणीय दिन रहेगा । आज हमने एक  रेलवे स्टेशन (सोलन) से दूसरे रेलवे स्टेशन (बरोग) तक केवल सफाई अभियान ही नहीं किया, अपितु पद यात्रा का भी भरपूर आनंद लिया ।
स्वच्छता एक जीवन मूल्य है । हमारे देश से इस मूल्य का क्षरण होना, हमारी शिक्षा की संस्थागत खामियों को उजागर करता है । स्वच्छता को शिक्षा का अभिन्न अंग बनाएं बगैर, हम सम्पूर्ण स्वच्छता के लक्ष्य को कभी हासिल नहीं कर सकते। हम में से प्रत्येक शिक्षक का नैतिक कर्तव्य बनता है कि बच्चों में इस मूल्य के विकास के लिए सदैव प्रयासरत रहे ।

शिक्षा क्रांति राज़कीय उच्च विद्यालय शमरोड़ (नौणी), सोलन के विद्यार्थियों को स्वच्छताग्रह का पाठ पढ़ाते हुए । We express our special gratitude to the head of the department, Mrs. Poonam Kalta for her ready cooperation in this regard.

Thursday, 24 September 2015

सेवा में, मुख्य चिकित्सा अधिकारी सोलन (हि. प्र) । महोदय जी, हम सोलन शहर में वालंटियर सफाई कर्मचारी हैं । हम प्रतिदिन सोलन को स्वच्छ और स्वस्थ बनाने के लिए, कहीं सफाई करते हैं, कहीं लोगों से स्वच्छ रहने का आग्रह करते हैं । इसी स्वच्छताग्रह के चलते, हम आपके परिसर में विगत वर्षों में कई सफाई अभियान कर चुकें हैं । हर बार गंदगी का आलम जस का तस देखने को मिलता है। समझ में नहीं आता कि किस कलम से एक चिकित्सा अधिकारी को गंदगी फैलने से होने वाले खतरों के बारे में लिखें । कृप्या अपने कार्यलय के धरातल के इर्द-गिर्द नियमित तौर पर सफाई व्यवस्था का प्रावधान करें । अस्पताल के चारों ओर गंदगी फैलाने वालों के खिलाफ सख्त जुर्माना हो ऐसी व्यवस्था अवश्य करें । धन्यवाद ।


Tuesday, 22 September 2015

चलते रहना ।



चलते रहना ।

सेवा-पथ पर चलते रहना 
तूफ़ान आए, आंधी आए 
पगडण्डी हो, पहाड़ आए 
पीछे कभी मुड़ न जाना l

आलोचक को ध्यान से सुनना
निंदक की परवाह न करना 
आलोचक होगा प्रेरक-प्रशंसक 
निंदक केवल संशय-वर्धक ।

निंदक सेवा-पथ पर क्या चलेगा 
केवल शब्दों में ही कसीदे कसेगा
अपने मस्तिष्क-चिंता के वमन से 
समाज को अधिक दूषित करेगा । 
दुनियां के दुःख और दर्द को 
समझने की खूब आहें भरेगा 
पूछोगे अगर साथ चलने को,
ulta पीछे hi हट जाएगा l

एक आलोचक शुभ चिंतक होगा 
अपने चिंतन में, अपने शब्दों में 
अवश्य ही साथ चलेगा l

एक आलोचक ढूध का ढूध,
पानी का पानी करने वाला
नीर-क्षीर-विवेक हंस होता है l
कब हमसे गलतियाँ हो सकती है
कैसे हमसे गलतियाँ हो सकती हैं  
वह दिन-रात हमें आगाह करता है ।

एक निंदक गलतियाँ हो जाने पर 
खूब काँव-काँव करता है 
ढूध फट जाने पर, जब छेना बन जाता है 
दूध का दूध, पानी का पानी 
करने वाला एक कौआ ही कहलाता है ।

सेवा-पथ पर चलते रहना 
तूफ़ान आए, आंधी आए 
पगडण्डी हो, पहाड़ आए 
पीछे कभी मुड़ न जाना l 
—सत्यन

Monday, 7 September 2015

प्रधानमंत्री कार्यलय ने शिक्षा-क्रांति के प्रकृति और समाज सेवा (स्वच्छताग्रह) की ओर गौर फरमाया, सहृदय आभार l


माननीय प्रधानमंत्री जी भारत l




GESM-11
                                                                  23.7.2015           

माननीय प्रधानमंत्री जी,


मैं आपका कोटि-२ धन्यवाद करता हूँ कि आपने शिक्षा-क्रांति के प्रकृति और समाज सेवा के काम-काज पर गौर फरमाया l जब हमें इसकी सूचना आपके पीएमओ निर्दिष्ट पत्र द्वारा प्राप्त हुई, तो मन में उमड़ते भावों ने यह अहसास दिलाया कि मैं एक लोकतांत्रिक देश का नागरिक हूँ l हम आशा करते हैं कि हमें जनहित कार्यों में सरकार के सभी सम्बंधित नुमाइंदों का अपेक्षित योगदान मिलेगा, जो कि आज तक दूभर ही रहा है l

शिक्षा राष्ट्र-विकास की इकाई है l हमारी भारतीय शिक्षा को रचनाधर्मी बनाने के उद्देश्य से मैंने और मेरे साथियों ने अपने युवा सामर्थ्य को संस्था के एक प्रोजेक्ट (एक विश्वस्तर की बहुभाषीय पत्रिका) “इण्डिया रिडीमिंग-एजुकेशन एंड लिटररी क्वार्टरली” के क्रियान्वयन में झोंक दिया l इस पत्रिका के चार संस्करण एक के बाद एक इस आशा के साथ प्रकाशित किये गए कि यह पत्रिका हिन्दुस्तान के लगभग 36000 कॉलजों और 600 युनिवर्सिटीज की लाइब्रेरीयों में केवल जगह ही न पायें, बल्कि इन सभी संस्थानों में कार्यरत शिक्षकों के साथ मिलकर यह देश में शिक्षा उत्थान का एक सामूहिक लक्ष्य भी निर्धारित करें l पत्रिका को सुधी पाठकों के सत्परामर्श के लिए दुनिया के कोने-२ तक भेजा गया l बावजूद इसके कि देश-विदेश से सब्स्क्रिप्शन सहित अनेकों सकारात्मक फीडबैक मिलें, संस्था ने प्रकाशन रोक दिया l पहला कारण, सम्बंधित शैक्षणिक विभाग और प्रदेश और केंद्र सरकार का न कोई सहयोग मिला, न प्रोत्साहन l दूसरा कारण, क्योंकि प्रकाशन को लेकर संस्था का उद्देश्य विशुद्ध सामाजिक रहा है, इसलिए इसे हिन्दुस्तान के सार्वजनिक शैक्षणिक संस्थानों में स्थान दिलाये बगैर कमर्शियल लाईन पर आगे ले जाना तो बेमानी ही है l
गौरतलब है कि यह पत्रिका न जाने किस अफसरशाही के दरबार में तीन वर्षों से लाल फीते में कैद, अपनी रिहाई के रेकोमेंडेशन लैटर और रजिस्ट्रेशन के दिन का अभी तक इंतज़ार कर रही है l यह पत्रिका अपनी ‘रिहाई’ और ‘रवानी’ के लिए आप भारत सरकार के महत्वाकांक्षी योजना ‘रीड इन इण्डिया’ की ओर आशा भरी निगाहों से देख रही है l

माननीय प्रधानमंत्री जी, यह एक संयोग वश ही है कि आप भारत सरकार की कई सुधारमूलक पहलों में से “स्वच्छ भारत मिशन” और “रीड इन इण्डिया” ऐसी दो महत्वाकांक्षी योजनायें हैं जो हमारी संस्था की दो परियोजनाओं — “एक रुपया दान, स्वच्छता अभियान, शिक्षा उत्थान” (स्वच्छताग्रह) और “पढ़ेगा भारत, बढ़ेगा भारत ”— से मेल खाती हैं l एक दशक की कड़ी बौद्धिक कसरत करते हुए, संस्था के स्वयंसेवी इन परियोजनाओं को आगे ले जाने में कृतसंकल्प रहे हैं l पहले प्रोजेक्ट के अंतर्गत हमने स्थानीय प्रशासन से लेकर पीमओ तक सहायतार्थ गुहार लगाई थी, जिसकी अभी तक जमीनी स्तर पर कोई सुनवाई नहीं हुई है l आज भी संस्था अपने स्वच्छता-अभियान के लिए गल्बज़, मास्क और स्वच्छता-सामग्री खरीदने तक के लिए एक-एक पैसे तक की मुहताज़ है l हमारी मांगों —हमारी संस्था को स्वच्छ रूप से सरकारी आर्थिक संरक्षण मिलें, गंदगी फ़ैलाने वालों के खिलाफ सख्त क़ानून का प्रावधान हो और उनका सख्ती से पालन हो— को स्थानीय प्रशासन न जाने क्यों पिछले कई वर्षों से अनदेखी कर रहा है ?
     
एक साहित्यज्ञ राजनेता से बेहतर यह कौन समझ सकता है कि शिक्षा राष्ट्र-उन्नति का आधार है; राष्ट्र में बोली, समझी, पढ़ी और लिखी जाने वाली भाषायें उस आधार की बहुमूल्य शिलाएं हैं l किसी भी राष्ट्र की भाषाएँ व उनमें रचित साहित्य उस राष्ट्र की ऐसी सांस्कृतिक राष्ट्र-सम्पदा हैं, जिसकी अनदेखी कर वह राष्ट्र —जो आर्थिक लिहाज़ से चाहे जितनी भी तरक्की कर लें— कभी भी सही मायनों में आगे नहीं बढ़ सकता l क्योंकि भाषाओं द्वारा पोषित कला, साहित्य और दर्शन की जिस समाज में अनदेखी होती है, उस समाज में मूल्यों का नाश होता है, इसलिए विकास-पथ पर यदि वह समाज एक कदम आगे बढ़ता है, तो अनैतिकता उसे दो कदम पीछे की ओर धकेल देती है l

आर्थिक उदारवाद के बाद भारत देश से भाषा, साहित्य और कला का कुछ लोप-सा हो गया है —निसंदेह इस कथन के कुछ अपवाद अवश्य हो सकते हैं l भाषा के नाम से विवाद, साहित्य के नाम से संकीर्ण साहित्य (लुगदी) और कला के नाम से कलह ही बढ़ते नजर आतें हैं l यदि हम इन कमीयों के कारणों के बारे में सोचना शुरू करें, तो एकाएक हमारा ध्यान हमारी वर्तमान शिक्षा प्रणाली की ओर आकर्षित हुए बिना नहीं रह सकता है l यह एक चिंता का विषय है कि हमारे सभी शिक्षण संस्थानों में (एलिमेंटरी एजुकेशन से लेकर हायर एजुकेशन तक) देश की इस सम्पदा का पालन-पोषण तो दूर, उल्टा इसका जाने-अनजाने में क्षरण ही हुआ है l हमारे शिक्षा तंत्र के लाखों शैक्षणिक संस्थानों में से कहीं एक भी ऐसा संस्थान नजर नहीं आता, जहां भाषाओं के मौलिक स्वरूप का संरक्षण हो ; जहां मौलिक लेखन सिखाया जाता हो, जहां मौलिक पठन सिखाया जाता हो l हमारे शिक्षा-तंत्र का भौतिक विस्तार जितनी तेजी से हो रहा है, इसकी गुणवता में गिरावट भी उतनी ही तेज़ी से देखने को मिल रही है l

माननीय प्रधानमन्त्री जी, शिक्षा-क्रांति के दस वर्षों के शोध से यह बात सामने आई है कि भाषा शिक्षा में गुणवता लाने का एक सर्वोत्तम औज़ार है l अतः हमारे शिक्षण संस्थानों में भाषाओं (हिंदी और इंगलिश) के संप्रेषण और साहित्यिक स्तर पर मौलिक लेखन और पाठन को बढ़ावा देने के उद्देश्य से, हम हमारी पत्रिका के प्रकाशन को बहाल करने के लिए केवल सरकारी आर्थिक संरक्षण ही नहीं चाहते, अपितु देश के सभी कॉलेजों और युनिवर्सिटीयों की लाईब्रेरियों में इसके सब्सक्रिप्शन हेतु recommendation letter की मांग भी करते हैं l
   
हम देश के शिक्षा नीति निर्माताओं का ध्यान इस तथ्य की ओर आकर्षित करना चाहेंगें कि शिक्षा में गुणवता लाने के सभी दावे तब तक खोखले ही साबित होंगें, जब तक हम अपने स्कूली पाठ्यक्रमों में ‘भाषा के स्थाई रूप के ज्ञान’ को बढ़ावा देने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठा लेते l यह एक गंभीर चिंता का विषय है कि हमारे शिक्षा-तंत्र से भाषा के ‘स्थाई रूप का ज्ञान’ गैर व्यवहारिक होता जा रहा है, फिर चाहे वह भाषा हिंदी हो या अंग्रेजी l जब एक भाषा का शिक्षा-तंत्र में कोई ख़ास ठौर-ठिकाना नहीं, तो देश के शैक्षणिक संस्थानों में उस भाषा के मौलिक लेखन, मौलिक पठन और प्रासंगिक साहित्य का क्या हश्र होगा, सिर्फ अंदाज़ा ही लगाया जा सकता है l हमारे समाज में भाषा और साहित्य के पदच्युत होने से ही राष्ट्र-मूल्यों का तेज़ी से क्षरण हुआ है l चूंकि भाषा का विचारों से वही नाता है जो नाता विचारों का कर्मों और जीवन मूल्यों से है, अतः जिस देश में भाषाओं का सम्मान नहीं होता, उस देश से परिश्रम और कर्मठता के विचार लुप्त होने लगते हैं l उस देश के नागरिक सामाजिक शाश्वत मूल्यों जैसे त्याग, सेवा और समर्पण से विहीन, अय्याश होने लगते हैं l क्या यह सब हमारे आधुनिक समाज के हरेक तबके में देखने को नहीं मिल रहा है ?
   
देश की भाषाई दक्षता बढ़ने से, हम हमारी शिक्षा के पाठ्यक्रमों को बनाने में विदेशों की अंधी नकल न कर, अपने देश के समाज और प्रकृति के अनुरूप बना सकते है l शिक्षा में भाषा, साहित्य और कला की विलुप्त होती प्रतिष्ठा को बहाल कर, हम वर्तमान भारतीय शिक्षा-प्रणाली को मूल्यों-परक बना सकते हैं l

माननीय प्रधानमंत्री जी, हमें केवल आशा ही नहीं, पूर्ण विश्वास भी है कि एक दशक से राष्ट्र-हित में हमारी संस्था द्वारा किए गए प्रयासों (पत्रिका के प्रकाशन एवं सरकारी स्कूलों में कम्युनिकेशन स्किल के माध्यम से बच्चों में समाज और प्रकृति सेवा के गुर सिखाने) का न केवल हमारे देश के नीति-निर्माता संज्ञान लेंगें, बल्कि भारत सरकार द्वारा इन प्रयासों को आर्थिक व गैर-आर्थिक संरक्षण भी अवश्य मिलेगा l
धन्यवाद l
आपका आभारी
सत्यन, अध्यक्ष शिक्षा-क्रांति, (Global Education Sensitization Society) c/o Satyan School of Languages, Kotlanala, Solan-173212. HP, India.
chairmangesm@gmail.com , www.gesm.in        098710-61520        









DISTRICT INSTITUTE OF EDUCATION & TRAINING, SOLAN (HP)



आज हमने प्रातः काल शिक्षा प्रशिक्षण संस्थान सोलन (DIET) का भ्रमण किया । परिसर के चारों ओर साफ़-सफाई की उचित व्यवस्था देख कर अति प्रसन्नता हुई । अब छात्रा वास के रसोई घर से कचरा सीधा नाले में नहीं फैंका जाता । इसके लिए संस्था का प्रशासन बधाई का पात्र है । गौरतलब है शिक्षा-क्रांति ने पिछले तीन वर्षों में संस्थान के आस-पास अनेकों बार सफाई-अभियान कियें हैं ।


IN AND AROUND THE DC & SP OFFICE PREMISES, SOLAN, (HP)


LET  THE  GARBAGE & CORRUPTION  NOT  SEEK  ASYLUM  IN  THE GOVERNMENTAL PREMISES  IN  ANY  FORM..... 



Govt. Post Graduate Cllege, Solan.

वातावरण की गंदगी हो या समाज में व्याप्त भष्टाचार, हमारे शिक्षण संस्थान इनकी जड़ों को खाद-पानी देने का काम कर रहे हैं l


Saturday, 5 September 2015

माननीय प्रधानमंत्री जी भारत के नाम पत्र --शिक्षा-क्रांति



                                                               

GESM-11
                                                                  23.7.2015           

माननीय प्रधानमंत्री जी,


मैं आपका कोटि-२ धन्यवाद करता हूँ कि आपने शिक्षा-क्रांति के प्रकृति और समाज सेवा के काम-काज पर गौर फरमाया l जब हमें इसकी सूचना आपके पीएमओ निर्दिष्ट पत्र द्वारा प्राप्त हुई, तो मन में उमड़ते भावों ने यह अहसास दिलाया कि मैं एक लोकतांत्रिक देश का नागरिक हूँ l हम आशा करते हैं कि हमें जनहित कार्यों में सरकार के सभी सम्बंधित नुमाइंदों का अपेक्षित योगदान मिलेगा, जो कि आज तक दूभर ही रहा है l

शिक्षा राष्ट्र-विकास की इकाई है l हमारी भारतीय शिक्षा को रचनाधर्मी बनाने के उद्देश्य से मैंने और मेरे साथियों ने अपने युवा सामर्थ्य को संस्था के एक प्रोजेक्ट (एक विश्वस्तर की बहुभाषीय पत्रिका) “इण्डिया रिडीमिंग-एजुकेशन एंड लिटररी क्वार्टरली” के क्रियान्वयन में झोंक दिया l इस पत्रिका के चार संस्करण एक के बाद एक इस आशा के साथ प्रकाशित किये गए कि यह पत्रिका हिन्दुस्तान के लगभग 36000 कॉलजों और 600 युनिवर्सिटीज की लाइब्रेरीयों में केवल जगह ही न पायें, बल्कि इन सभी संस्थानों में कार्यरत शिक्षकों के साथ मिलकर यह देश में शिक्षा उत्थान का एक सामूहिक लक्ष्य भी निर्धारित करें l पत्रिका को सुधी पाठकों के सत्परामर्श के लिए दुनिया के कोने-२ तक भेजा गया l बावजूद इसके कि देश-विदेश से सब्स्क्रिप्शन सहित अनेकों सकारात्मक फीडबैक मिलें, संस्था ने प्रकाशन रोक दिया l पहला कारण, सम्बंधित शैक्षणिक विभाग और प्रदेश और केंद्र सरकार का न कोई सहयोग मिला, न प्रोत्साहन l दूसरा कारण, क्योंकि प्रकाशन को लेकर संस्था का उद्देश्य विशुद्ध सामाजिक रहा है, इसलिए इसे हिन्दुस्तान के सार्वजनिक शैक्षणिक संस्थानों में स्थान दिलाये बगैर कमर्शियल लाईन पर आगे ले जाना तो बेमानी ही है l
गौरतलब है कि यह पत्रिका न जाने किस अफसरशाही के दरबार में तीन वर्षों से लाल फीते में कैद, अपनी रिहाई के रेकोमेंडेशन लैटर और रजिस्ट्रेशन के दिन का अभी तक इंतज़ार कर रही है l यह पत्रिका अपनी ‘रिहाई’ और ‘रवानी’ के लिए आप भारत सरकार के महत्वाकांक्षी योजना ‘रीड इन इण्डिया’ की ओर आशा भरी निगाहों से देख रही है l

माननीय प्रधानमंत्री जी, यह एक संयोग वश ही है कि आप भारत सरकार की कई सुधारमूलक पहलों में से “स्वच्छ भारत मिशन” और “रीड इन इण्डिया” ऐसी दो महत्वाकांक्षी योजनायें हैं जो हमारी संस्था की दो परियोजनाओं — “एक रुपया दान, स्वच्छता अभियान, शिक्षा उत्थान” (स्वच्छताग्रह) और “पढ़ेगा भारत, बढ़ेगा भारत ”— से मेल खाती हैं l एक दशक की कड़ी बौद्धिक कसरत करते हुए, संस्था के स्वयंसेवी इन परियोजनाओं को आगे ले जाने में कृतसंकल्प रहे हैं l पहले प्रोजेक्ट के अंतर्गत हमने स्थानीय प्रशासन से लेकर पीमओ तक सहायतार्थ गुहार लगाई थी, जिसकी अभी तक जमीनी स्तर पर कोई सुनवाई नहीं हुई है l आज भी संस्था अपने स्वच्छता-अभियान के लिए गल्बज़, मास्क और स्वच्छता-सामग्री खरीदने तक के लिए एक-एक पैसे तक की मुहताज़ है l हमारी मांगों —हमारी संस्था को स्वच्छ रूप से सरकारी आर्थिक संरक्षण मिलें, गंदगी फ़ैलाने वालों के खिलाफ सख्त क़ानून का प्रावधान हो और उनका सख्ती से पालन हो— को स्थानीय प्रशासन न जाने क्यों पिछले कई वर्षों से अनदेखी कर रहा है ?
     
एक साहित्यज्ञ राजनेता से बेहतर यह कौन समझ सकता है कि शिक्षा राष्ट्र-उन्नति का आधार है; राष्ट्र में बोली, समझी, पढ़ी और लिखी जाने वाली भाषायें उस आधार की बहुमूल्य शिलाएं हैं l किसी भी राष्ट्र की भाषाएँ व उनमें रचित साहित्य उस राष्ट्र की ऐसी सांस्कृतिक राष्ट्र-सम्पदा हैं, जिसकी अनदेखी कर वह राष्ट्र —जो आर्थिक लिहाज़ से चाहे जितनी भी तरक्की कर लें— कभी भी सही मायनों में आगे नहीं बढ़ सकता l क्योंकि भाषाओं द्वारा पोषित कला, साहित्य और दर्शन की जिस समाज में अनदेखी होती है, उस समाज में मूल्यों का नाश होता है, इसलिए विकास-पथ पर यदि वह समाज एक कदम आगे बढ़ता है, तो अनैतिकता उसे दो कदम पीछे की ओर धकेल देती है l

आर्थिक उदारवाद के बाद भारत देश से भाषा, साहित्य और कला का कुछ लोप-सा हो गया है —निसंदेह इस कथन के कुछ अपवाद अवश्य हो सकते हैं l भाषा के नाम से विवाद, साहित्य के नाम से संकीर्ण साहित्य (लुगदी) और कला के नाम से कलह ही बढ़ते नजर आतें हैं l यदि हम इन कमीयों के कारणों के बारे में सोचना शुरू करें, तो एकाएक हमारा ध्यान हमारी वर्तमान शिक्षा प्रणाली की ओर आकर्षित हुए बिना नहीं रह सकता है l यह एक चिंता का विषय है कि हमारे सभी शिक्षण संस्थानों में (एलिमेंटरी एजुकेशन से लेकर हायर एजुकेशन तक) देश की इस सम्पदा का पालन-पोषण तो दूर, उल्टा इसका जाने-अनजाने में क्षरण ही हुआ है l हमारे शिक्षा तंत्र के लाखों शैक्षणिक संस्थानों में से कहीं एक भी ऐसा संस्थान नजर नहीं आता, जहां भाषाओं के मौलिक स्वरूप का संरक्षण हो ; जहां मौलिक लेखन सिखाया जाता हो, जहां मौलिक पठन सिखाया जाता हो l हमारे शिक्षा-तंत्र का भौतिक विस्तार जितनी तेजी से हो रहा है, इसकी गुणवता में गिरावट भी उतनी ही तेज़ी से देखने को मिल रही है l

माननीय प्रधानमन्त्री जी, शिक्षा-क्रांति के दस वर्षों के शोध से यह बात सामने आई है कि भाषा शिक्षा में गुणवता लाने का एक सर्वोत्तम औज़ार है l अतः हमारे शिक्षण संस्थानों में भाषाओं (हिंदी और इंगलिश) के संप्रेषण और साहित्यिक स्तर पर मौलिक लेखन और पाठन को बढ़ावा देने के उद्देश्य से, हम हमारी पत्रिका के प्रकाशन को बहाल करने के लिए केवल सरकारी आर्थिक संरक्षण ही नहीं चाहते, अपितु देश के सभी कॉलेजों और युनिवर्सिटीयों की लाईब्रेरियों में इसके सब्सक्रिप्शन हेतु recommendation letter की मांग भी करते हैं l
   
हम देश के शिक्षा नीति निर्माताओं का ध्यान इस तथ्य की ओर आकर्षित करना चाहेंगें कि शिक्षा में गुणवता लाने के सभी दावे तब तक खोखले ही साबित होंगें, जब तक हम अपने स्कूली पाठ्यक्रमों में ‘भाषा के स्थाई रूप के ज्ञान’ को बढ़ावा देने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठा लेते l यह एक गंभीर चिंता का विषय है कि हमारे शिक्षा-तंत्र से भाषा के ‘स्थाई रूप का ज्ञान’ गैर व्यवहारिक होता जा रहा है, फिर चाहे वह भाषा हिंदी हो या अंग्रेजी l जब एक भाषा का शिक्षा-तंत्र में कोई ख़ास ठौर-ठिकाना नहीं, तो देश के शैक्षणिक संस्थानों में उस भाषा के मौलिक लेखन, मौलिक पठन और प्रासंगिक साहित्य का क्या हश्र होगा, सिर्फ अंदाज़ा ही लगाया जा सकता है l हमारे समाज में भाषा और साहित्य के पदच्युत होने से ही राष्ट्र-मूल्यों का तेज़ी से क्षरण हुआ है l चूंकि भाषा का विचारों से वही नाता है जो नाता विचारों का कर्मों और जीवन मूल्यों से है, अतः जिस देश में भाषाओं का सम्मान नहीं होता, उस देश से परिश्रम और कर्मठता के विचार लुप्त होने लगते हैं l उस देश के नागरिक सामाजिक शाश्वत मूल्यों जैसे त्याग, सेवा और समर्पण से विहीन, अय्याश होने लगते हैं l क्या यह सब हमारे आधुनिक समाज के हरेक तबके में देखने को नहीं मिल रहा है ?
   
देश की भाषाई दक्षता बढ़ने से, हम हमारी शिक्षा के पाठ्यक्रमों को बनाने में विदेशों की अंधी नकल न कर, अपने देश के समाज और प्रकृति के अनुरूप बना सकते है l शिक्षा में भाषा, साहित्य और कला की विलुप्त होती प्रतिष्ठा को बहाल कर, हम वर्तमान भारतीय शिक्षा-प्रणाली को मूल्यों-परक बना सकते हैं l

माननीय प्रधानमंत्री जी, हमें केवल आशा ही नहीं, पूर्ण विश्वास भी है कि एक दशक से राष्ट्र-हित में हमारी संस्था द्वारा किए गए प्रयासों (पत्रिका के प्रकाशन एवं सरकारी स्कूलों में कम्युनिकेशन स्किल के माध्यम से बच्चों में समाज और प्रकृति सेवा के गुर सिखाने) का न केवल हमारे देश के नीति-निर्माता संज्ञान लेंगें, बल्कि भारत सरकार द्वारा इन प्रयासों को आर्थिक व गैर-आर्थिक संरक्षण भी अवश्य मिलेगा l
धन्यवाद l
आपका आभारी
सत्यन, अध्यक्ष शिक्षा-क्रांति, (Global Education Sensitization Society) c/o Satyan School of Languages, Kotlanala, Solan-173212. HP, India.
chairmangesm@gmail.com , www.gesm.in        098710-61520