Tuesday, 27 October 2015

माननीय पी एम ओ कार्यालय भारत



माननीय पी एम ओ भारत,                                   शिक्षा-क्रांति :19.10.2015

यह एक राष्ट्रीय महत्व का विषय है कि माननीय प्रधानमन्त्री कार्यालय शिक्षा-क्रांति के सामाजिक-सौदेश्यता का निरंतर संज्ञान ले रहा है l गौतलब है कि शिक्षा-क्रांति देश के उन आम किंतु जागरूक नागरिकों द्वारा संचालित एक ऐसी सामाजिक संस्था है, जिसका मूल उददेश्य देश में स्वच्छता के मूल्य को लोक प्रतिष्ठित करना है l देश में व्याप्त गंदगी (कचरा और भ्रष्टाचार) के चलते, यह संस्था अभी तक अपने मूल-लक्ष्य की प्राप्ति के लिए वांछित धन (grant-in-aid) के रूप में एक नया पैसा भी कहीं से जुटा नहीं पाई है; और तो और, एक लंबे अरसे से संस्था के पुनीत कार्यों को अनदेखा और विचारों को खुलेआम अनसुना किया गया है l अतः ऐसे में यदि देश का सर्वोच्च सरकारी प्रतिष्ठान शिक्षा-क्रांति संस्था की बातों पर महज़ गौर फरमायें, तो क्या यह अपनेआप में एक विस्मयकारी घटना नहीं है ?
जब एक देश के नागरिकों को अपने नेताओं को चुनने की सम्पूर्ण आजादी मिलती है, तो उस देश में लोकतंत्र की मूल भावना का जन्म होता है l जब देश के आम नागरिकों को अपने नेताओं से संवाद स्थापित करने के अवसर प्राप्त होते हैं, तो उस देश में लोकतंत्र को जुबान मिलती है l और जब देश के नेताओं की जीवन-शैली जनता के रहन-सहन एवं आचार-विचार से मेल खाती हो, तो देश में एक प्रौढ़ एवं समता मूलक लोकतंत्र की पुष्टि होती है l

किसी भी लोकतंत्र की मजबूती के लिए यह एक अत्यावश्यक शर्त है कि इसका नेतृत्व करते शीर्ष के लोग राष्ट्र-हित को अपने संस्थागत स्वार्थ से उपर रखें l मुझे नहीं मालुम कि भारत-लोकतंत्र के राज़ नेता, समाज नेता, ‘धर्म’ नेता, धन नेता, मिडिया नेता और कला नेता समाज और प्रकृति के प्रति अपने कर्तव्यों का पालन कर रहे हैं या नहीं l लेकिन मेरा समाज सेवा का एक दशक का अनुभव कहता है कि हमारे इन नेताओं से अपने राष्ट्रीय कर्तव्यों के पालन में कहीं न कहीं गहरी भूलें होती जा रही है l कहीं इनका संचालन-कौशल मोर्चा खा रहा है, तो कहीं इनका स्वार्थ आड़े आ रहा है l इन्हीं नेतृत्व मूलक भूलों का परिणाम है कि आज हमारे देश में सार्वजनिक जीवन का अवमूल्यन तेज़ी से हो रहा है l देश से गरीबी और गंदगी (कचरा और भ्रष्टाचार) जाने का नाम ही नहीं ले रहे हैं l

हमारे देश के धन-नेता देश से गरीबी और गंदगी मिटाने की अपनी अपार क्षमता को या तो पहचान नहीं रहे हैं या पहचानना नहीं चाहते l अमीरी केवल एक स्वच्छ और समृद्ध देश के वातावरण में ही लंबे समय तक फल-फूल सकती है l अमीरी गंदगी और गरीबी के दुष्प्रभाव से ज्यादा देर तक नहीं  बच सकती l गरीबी की चीत्कारें अमीरी को चैन से सोने नहीं देगी और गंदगी की विषाणु-युक्त-हवा उसके (अमीरों के) ड्राइंग रूम तक देर-सवेर पहुँच ही जायेगी l धन नेताओं को आत्म अवलोकन करना चाहिए कि धन इकठ्ठा करने के लिए वे जिस समाज के human resources का प्रयोग कर रहे हैं और जिस प्रकृति के natural resouces का उपभोग कर रहे हैं; उसके बदले वे उस समाज और प्रकृति को क्या दे रहे है ? गरीबी और गंदगी l

देश में अमीरी और गरीबी के बीच बढ़ती खाई दिन-प्रति-दिन कितनी चौड़ी होती जा रही है, इसका अंदाज़ा एक ताज़ा रिपोर्ट से लगाया जा सकता है; “वर्ष 2000-15 के बीच भारत में 2.284 खरब डॉलर धन पैदा हुआ, जिसका 61 प्रतिशत हिस्सा सर्वोच्च एक प्रतिशत जनता के पास चला गया l टॉप 10 प्रतिशत आबादी के पास कुल उत्पन्न राष्ट्रीय धन का 81 प्रतिशत भाग गया l” क्या आने वाले 15 वर्षों में भारत के 10% लोगों के पास 100% धन इकट्ठा होगा ? क्या इस आर्थिक गैर-बराबरी की खाई के चौड़े होने से देश से गरीबी और गंदगी कम हो सकती है ? असंभव l  

देश के कॉर्पोरेट वर्ल्ड में यदि सामाजिक सौदेश्यता की भावना जीवंत हो जाए, तो वह देश से गंदगी और गरीबी खत्म करने में अपनी अग्रिणी भूमिका निभा सकता है l निःसंदेह इस कार्य सिद्धि में राजनैतिक इच्छा शक्ति की तो निहायत आवश्यकता है l

हमारे देश में कॉर्पोरेट हाउसेस बड़े-बड़े बुधिजीवी चला रहे है, अतः देश कैसे स्वच्छ और समृद्ध हो, इसके तरीकों को खोजना उनके लिए कोई बड़ी बात नहीं हो सकती, यदि वे चाहे तो l
माननीय प्रधानमंत्री कार्यालय, हम यहाँ एक छोटा सा सुझाव आपके विचारार्थ पेश करना चाहते है l आशा करते हैं कि आप इस विचार को आगे संशोधित और परिमार्जित कर, इसे अखिल भारतीय स्वरूप अवश्य देंगें l

सबसे पहले देश में ऐसा सख्त क़ानून बनें, जो हिन्दुस्तान की उन सभी कम्पनियों की (जो packeged food और beverages जैसे Lays, Uncle Chips, kurkure, mango maza, Coke, Pepsi आदि बनाती है) प्रकृति और समाज के प्रति ज़िम्मेदारी सुनिश्चित करें l इन कम्पनियों से  Corporate Social Responsibilty के तहत हर वर्ष जितना धन इकट्ठा किया जाता है, उसे इमानदारी और सटीकता से भारत को स्वच्छ बनानें में ही लगाया जाए l उस धन राशी से हिन्दुस्तान के प्रत्येक शहर में अच्छी गुणवता के Waste management plants स्थापित किये जाए l विशेषकर प्लास्टिक रैपरज़ और डिस्पोज़ेब्ल बोतले, ग्लास, चमच्च और कप को ठिकाने लगाने के लिए प्रत्येक शहर में कम से कम एक रिसाइक्लिंग प्लांट स्थापित किया जाए l इससे वातावरण के हर रोज़ होने वाले कबाड़े में जरूर कमी आएगी, ऐसा हमारा पूर्ण विश्वास है l इस कार्य-सिद्धि के लिए यह आवश्यक है कि सबसे पहले कचरे को मूल्यवान बनाने के लिए ठोस कदम उठाए जायें l उदाहरणार्थ क्या यह संभव है कि चिप्स, कुरकुरे, लेज़, माज़ा आदि के वेस्ट रैपरों और डिस्पोजेबल को दुकानदार पांच-दस रूपये प्रति कि. ग्रा. वापिस खरीदें या इसे खरीदे जाने का एक जगह प्रावधान हो ? क्या इस तरह एकत्रित किए जाने पर वेस्ट मटेरियल को नियमित तौर से नजदीकी रीसाइक्लिंग प्लांट्स भिज़वा दिये जाने की व्यवस्था नहीं हो सकती?

देश में शिक्षा-क्रांति की तरह असंख्य ऐसी सामाजिक संस्थाएं हैं, जो वर्षों से स्वच्छता के कार्य में तो लगी हैं, लेकिन उनकी कहीं कोई पूछ नहीं है l स्वच्छता के नाम से जो ‘उपर वालों’ से प्रतिवर्ष करोड़ो रूपये आते है, उस धन की भ्रष्टाचार के दानव से रक्षा कर, सटीकता से केवल स्वच्छता के कार्य में ही लगाया जाना चाहिए l इसमें दो राय नहीं है कि यदि इस विचार पर मंथन हो तथा इसका स्वच्छ रूप से देश में क्रियान्वयन हो, तो इस योजना से न केवल भारत स्वच्छता की ओर आगे बड़ेगा, बल्कि अनेकों सामाजिक संस्थाओं के लाखों स्वयंसेवकों के लिए रोज़गार के अवसर भी पैदा होंगें l ऐसा केवल मेरा ही मानना नहीं, बल्कि देश के अनेकों जागरूक नागरिकों का भी यही एकमत है, जिनसे इन दिनों शिक्षा-क्रांति संस्था अनेकों सार्वज़निक स्थानों जैसे रेलवे स्टेशन, बस स्टैंड, मार्किटों, स्कूलों, कॉलेजों और युनिवर्सिटीज़ आदि में निरंतर रूबरू हो रही है l      धन्यवाद l      आपका आभारी— सत्यन  
शिक्षा-क्रांति c/o Satyan school of Languages, near PG College, Solan. www.gesm.in , 01792-324020, 98170-61520.


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