Monday, 7 September 2015

प्रधानमंत्री कार्यलय ने शिक्षा-क्रांति के प्रकृति और समाज सेवा (स्वच्छताग्रह) की ओर गौर फरमाया, सहृदय आभार l


माननीय प्रधानमंत्री जी भारत l




GESM-11
                                                                  23.7.2015           

माननीय प्रधानमंत्री जी,


मैं आपका कोटि-२ धन्यवाद करता हूँ कि आपने शिक्षा-क्रांति के प्रकृति और समाज सेवा के काम-काज पर गौर फरमाया l जब हमें इसकी सूचना आपके पीएमओ निर्दिष्ट पत्र द्वारा प्राप्त हुई, तो मन में उमड़ते भावों ने यह अहसास दिलाया कि मैं एक लोकतांत्रिक देश का नागरिक हूँ l हम आशा करते हैं कि हमें जनहित कार्यों में सरकार के सभी सम्बंधित नुमाइंदों का अपेक्षित योगदान मिलेगा, जो कि आज तक दूभर ही रहा है l

शिक्षा राष्ट्र-विकास की इकाई है l हमारी भारतीय शिक्षा को रचनाधर्मी बनाने के उद्देश्य से मैंने और मेरे साथियों ने अपने युवा सामर्थ्य को संस्था के एक प्रोजेक्ट (एक विश्वस्तर की बहुभाषीय पत्रिका) “इण्डिया रिडीमिंग-एजुकेशन एंड लिटररी क्वार्टरली” के क्रियान्वयन में झोंक दिया l इस पत्रिका के चार संस्करण एक के बाद एक इस आशा के साथ प्रकाशित किये गए कि यह पत्रिका हिन्दुस्तान के लगभग 36000 कॉलजों और 600 युनिवर्सिटीज की लाइब्रेरीयों में केवल जगह ही न पायें, बल्कि इन सभी संस्थानों में कार्यरत शिक्षकों के साथ मिलकर यह देश में शिक्षा उत्थान का एक सामूहिक लक्ष्य भी निर्धारित करें l पत्रिका को सुधी पाठकों के सत्परामर्श के लिए दुनिया के कोने-२ तक भेजा गया l बावजूद इसके कि देश-विदेश से सब्स्क्रिप्शन सहित अनेकों सकारात्मक फीडबैक मिलें, संस्था ने प्रकाशन रोक दिया l पहला कारण, सम्बंधित शैक्षणिक विभाग और प्रदेश और केंद्र सरकार का न कोई सहयोग मिला, न प्रोत्साहन l दूसरा कारण, क्योंकि प्रकाशन को लेकर संस्था का उद्देश्य विशुद्ध सामाजिक रहा है, इसलिए इसे हिन्दुस्तान के सार्वजनिक शैक्षणिक संस्थानों में स्थान दिलाये बगैर कमर्शियल लाईन पर आगे ले जाना तो बेमानी ही है l
गौरतलब है कि यह पत्रिका न जाने किस अफसरशाही के दरबार में तीन वर्षों से लाल फीते में कैद, अपनी रिहाई के रेकोमेंडेशन लैटर और रजिस्ट्रेशन के दिन का अभी तक इंतज़ार कर रही है l यह पत्रिका अपनी ‘रिहाई’ और ‘रवानी’ के लिए आप भारत सरकार के महत्वाकांक्षी योजना ‘रीड इन इण्डिया’ की ओर आशा भरी निगाहों से देख रही है l

माननीय प्रधानमंत्री जी, यह एक संयोग वश ही है कि आप भारत सरकार की कई सुधारमूलक पहलों में से “स्वच्छ भारत मिशन” और “रीड इन इण्डिया” ऐसी दो महत्वाकांक्षी योजनायें हैं जो हमारी संस्था की दो परियोजनाओं — “एक रुपया दान, स्वच्छता अभियान, शिक्षा उत्थान” (स्वच्छताग्रह) और “पढ़ेगा भारत, बढ़ेगा भारत ”— से मेल खाती हैं l एक दशक की कड़ी बौद्धिक कसरत करते हुए, संस्था के स्वयंसेवी इन परियोजनाओं को आगे ले जाने में कृतसंकल्प रहे हैं l पहले प्रोजेक्ट के अंतर्गत हमने स्थानीय प्रशासन से लेकर पीमओ तक सहायतार्थ गुहार लगाई थी, जिसकी अभी तक जमीनी स्तर पर कोई सुनवाई नहीं हुई है l आज भी संस्था अपने स्वच्छता-अभियान के लिए गल्बज़, मास्क और स्वच्छता-सामग्री खरीदने तक के लिए एक-एक पैसे तक की मुहताज़ है l हमारी मांगों —हमारी संस्था को स्वच्छ रूप से सरकारी आर्थिक संरक्षण मिलें, गंदगी फ़ैलाने वालों के खिलाफ सख्त क़ानून का प्रावधान हो और उनका सख्ती से पालन हो— को स्थानीय प्रशासन न जाने क्यों पिछले कई वर्षों से अनदेखी कर रहा है ?
     
एक साहित्यज्ञ राजनेता से बेहतर यह कौन समझ सकता है कि शिक्षा राष्ट्र-उन्नति का आधार है; राष्ट्र में बोली, समझी, पढ़ी और लिखी जाने वाली भाषायें उस आधार की बहुमूल्य शिलाएं हैं l किसी भी राष्ट्र की भाषाएँ व उनमें रचित साहित्य उस राष्ट्र की ऐसी सांस्कृतिक राष्ट्र-सम्पदा हैं, जिसकी अनदेखी कर वह राष्ट्र —जो आर्थिक लिहाज़ से चाहे जितनी भी तरक्की कर लें— कभी भी सही मायनों में आगे नहीं बढ़ सकता l क्योंकि भाषाओं द्वारा पोषित कला, साहित्य और दर्शन की जिस समाज में अनदेखी होती है, उस समाज में मूल्यों का नाश होता है, इसलिए विकास-पथ पर यदि वह समाज एक कदम आगे बढ़ता है, तो अनैतिकता उसे दो कदम पीछे की ओर धकेल देती है l

आर्थिक उदारवाद के बाद भारत देश से भाषा, साहित्य और कला का कुछ लोप-सा हो गया है —निसंदेह इस कथन के कुछ अपवाद अवश्य हो सकते हैं l भाषा के नाम से विवाद, साहित्य के नाम से संकीर्ण साहित्य (लुगदी) और कला के नाम से कलह ही बढ़ते नजर आतें हैं l यदि हम इन कमीयों के कारणों के बारे में सोचना शुरू करें, तो एकाएक हमारा ध्यान हमारी वर्तमान शिक्षा प्रणाली की ओर आकर्षित हुए बिना नहीं रह सकता है l यह एक चिंता का विषय है कि हमारे सभी शिक्षण संस्थानों में (एलिमेंटरी एजुकेशन से लेकर हायर एजुकेशन तक) देश की इस सम्पदा का पालन-पोषण तो दूर, उल्टा इसका जाने-अनजाने में क्षरण ही हुआ है l हमारे शिक्षा तंत्र के लाखों शैक्षणिक संस्थानों में से कहीं एक भी ऐसा संस्थान नजर नहीं आता, जहां भाषाओं के मौलिक स्वरूप का संरक्षण हो ; जहां मौलिक लेखन सिखाया जाता हो, जहां मौलिक पठन सिखाया जाता हो l हमारे शिक्षा-तंत्र का भौतिक विस्तार जितनी तेजी से हो रहा है, इसकी गुणवता में गिरावट भी उतनी ही तेज़ी से देखने को मिल रही है l

माननीय प्रधानमन्त्री जी, शिक्षा-क्रांति के दस वर्षों के शोध से यह बात सामने आई है कि भाषा शिक्षा में गुणवता लाने का एक सर्वोत्तम औज़ार है l अतः हमारे शिक्षण संस्थानों में भाषाओं (हिंदी और इंगलिश) के संप्रेषण और साहित्यिक स्तर पर मौलिक लेखन और पाठन को बढ़ावा देने के उद्देश्य से, हम हमारी पत्रिका के प्रकाशन को बहाल करने के लिए केवल सरकारी आर्थिक संरक्षण ही नहीं चाहते, अपितु देश के सभी कॉलेजों और युनिवर्सिटीयों की लाईब्रेरियों में इसके सब्सक्रिप्शन हेतु recommendation letter की मांग भी करते हैं l
   
हम देश के शिक्षा नीति निर्माताओं का ध्यान इस तथ्य की ओर आकर्षित करना चाहेंगें कि शिक्षा में गुणवता लाने के सभी दावे तब तक खोखले ही साबित होंगें, जब तक हम अपने स्कूली पाठ्यक्रमों में ‘भाषा के स्थाई रूप के ज्ञान’ को बढ़ावा देने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठा लेते l यह एक गंभीर चिंता का विषय है कि हमारे शिक्षा-तंत्र से भाषा के ‘स्थाई रूप का ज्ञान’ गैर व्यवहारिक होता जा रहा है, फिर चाहे वह भाषा हिंदी हो या अंग्रेजी l जब एक भाषा का शिक्षा-तंत्र में कोई ख़ास ठौर-ठिकाना नहीं, तो देश के शैक्षणिक संस्थानों में उस भाषा के मौलिक लेखन, मौलिक पठन और प्रासंगिक साहित्य का क्या हश्र होगा, सिर्फ अंदाज़ा ही लगाया जा सकता है l हमारे समाज में भाषा और साहित्य के पदच्युत होने से ही राष्ट्र-मूल्यों का तेज़ी से क्षरण हुआ है l चूंकि भाषा का विचारों से वही नाता है जो नाता विचारों का कर्मों और जीवन मूल्यों से है, अतः जिस देश में भाषाओं का सम्मान नहीं होता, उस देश से परिश्रम और कर्मठता के विचार लुप्त होने लगते हैं l उस देश के नागरिक सामाजिक शाश्वत मूल्यों जैसे त्याग, सेवा और समर्पण से विहीन, अय्याश होने लगते हैं l क्या यह सब हमारे आधुनिक समाज के हरेक तबके में देखने को नहीं मिल रहा है ?
   
देश की भाषाई दक्षता बढ़ने से, हम हमारी शिक्षा के पाठ्यक्रमों को बनाने में विदेशों की अंधी नकल न कर, अपने देश के समाज और प्रकृति के अनुरूप बना सकते है l शिक्षा में भाषा, साहित्य और कला की विलुप्त होती प्रतिष्ठा को बहाल कर, हम वर्तमान भारतीय शिक्षा-प्रणाली को मूल्यों-परक बना सकते हैं l

माननीय प्रधानमंत्री जी, हमें केवल आशा ही नहीं, पूर्ण विश्वास भी है कि एक दशक से राष्ट्र-हित में हमारी संस्था द्वारा किए गए प्रयासों (पत्रिका के प्रकाशन एवं सरकारी स्कूलों में कम्युनिकेशन स्किल के माध्यम से बच्चों में समाज और प्रकृति सेवा के गुर सिखाने) का न केवल हमारे देश के नीति-निर्माता संज्ञान लेंगें, बल्कि भारत सरकार द्वारा इन प्रयासों को आर्थिक व गैर-आर्थिक संरक्षण भी अवश्य मिलेगा l
धन्यवाद l
आपका आभारी
सत्यन, अध्यक्ष शिक्षा-क्रांति, (Global Education Sensitization Society) c/o Satyan School of Languages, Kotlanala, Solan-173212. HP, India.
chairmangesm@gmail.com , www.gesm.in        098710-61520        









DISTRICT INSTITUTE OF EDUCATION & TRAINING, SOLAN (HP)



आज हमने प्रातः काल शिक्षा प्रशिक्षण संस्थान सोलन (DIET) का भ्रमण किया । परिसर के चारों ओर साफ़-सफाई की उचित व्यवस्था देख कर अति प्रसन्नता हुई । अब छात्रा वास के रसोई घर से कचरा सीधा नाले में नहीं फैंका जाता । इसके लिए संस्था का प्रशासन बधाई का पात्र है । गौरतलब है शिक्षा-क्रांति ने पिछले तीन वर्षों में संस्थान के आस-पास अनेकों बार सफाई-अभियान कियें हैं ।


IN AND AROUND THE DC & SP OFFICE PREMISES, SOLAN, (HP)


LET  THE  GARBAGE & CORRUPTION  NOT  SEEK  ASYLUM  IN  THE GOVERNMENTAL PREMISES  IN  ANY  FORM..... 



Govt. Post Graduate Cllege, Solan.

वातावरण की गंदगी हो या समाज में व्याप्त भष्टाचार, हमारे शिक्षण संस्थान इनकी जड़ों को खाद-पानी देने का काम कर रहे हैं l