Monday, 26 January 2015

पत्र मित्र के नाम



                                                 


                                      पत्र मित्र के नाम                                              सोलन :16 .01.2015 


प्रिय मित्र,

प्रसन्न रहो l हमने आपसे वादा किया था कि हम भविष्य में आपको यदा-कदा पत्र अवश्य लिखा करेंगें l वादाखिलाफ़ी से डरते हैं, सो लिख रहे हैं l मन कर रहा है, सो लिख रहे हैं l कुछ लिखना चाह रहा हूँ, पर पता नहीं क्यों कुछ सूझ ही नहीं रहा, मानो मेरी सूझ-बूझ ही गुल हो गई हो l लगता है मझे “writer’s block”  का दौरा पड़ रहा है l  शायद ऐसा नहीं हो सकता, क्योंकि मैं कहां का लेखक हूँ, मैं तो एक समाज सेवक हूँ l मैं एक लेखक होता तो शायद मैं अपने लेखन-कार्य से ऊब जाता l किन्तु, न जाने त्याग और सेवा के काम में क्या ऐसी शक्ति है कि हम न तो आज तक कभी सेवा के कार्य से उदासीन हुए है और न कभी त्याग के भाव से शून्य l

अरे हाँ, क्यों न तुम्हारी पढ़ने की रूची को ध्यान में रख कर कुछ लिखा जाए l मतलब अध्यात्म जैसे गूढ़ विषय पर कुछ लिखने का प्रयास किया जा सकता है l आओ हम हमारी पूर्व की डीबेटेबल अधूरी बातों के अनछुयें पहलुओं पर विचार-विमर्श करें l

माया क्या है ? हमारे जीवन में सम्प्रदाय (धर्म) का क्या महत्व है ? हमारे जीवन में गुरु का क्या महत्व है ? 

इस संसार में माया कितनी विरुदार्थक है, कितनी विरोधाभासी है l हमारे शास्त्र (प्राचीन भारतीय साहित्य) कहते हैं कि माया है भी है, यह है भी नहीं l अगर हम इसे वर्तमान परिप्रेक्ष्य में देख कर समझे, तो इसके (माया के) होने का सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि इसके चलते आज के मनुष्य में स्वार्थ, अर्थलोलुपता, लालच, लस्ट, हिंसा इत्यादि बढ़ते ही जा रहे हैं, संसार में अशांति और दुःख का सबसे बड़ा कारण माया ही है l अतः हम कह सकते हैं कि माया का अस्तित्व है l दूसरी ओर, इसके न होने का सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि जब हम सत्य और ‘धर्म’ के मार्ग पर चल कर अपना जीवन जीते हैं, तो हमारे लिए माया का अस्तित्व ही खत्म हो जाता है l 

हमारे जीवन में सम्प्रदाय का महत्व है भी है और है भी नहीं l  महत्व क्यों है ? सम्प्रदाय (Religion) मानव-सभ्यता की महान उपलब्धियों में से एक है l सम्प्रदायों के माध्यम से ही जन-मानस में जीवन-मूल्यों का संचार होता है l केवल कल्पना ही की जा सकती है कि बिना जीवन-मूल्यों के मानव-सभ्यता की यात्रा का क्या होगा l महत्व क्यों कम हो जाता है? हमारे जीवन में सम्प्रदाय के महत्व पे सवालिया निशान लगना तब शुरू हो जाता है, जब हमारी सत्य को खोजने की दृष्टि संकीर्ण एवं संकुचित हो जाती है, जब हम अपने सम्प्रदाय को विशिष्टतम ‘मनाने’ की तैयारीयों में जुट जाते हैं l हम अपने सम्प्रदाय को लेकर कट्टर हो जाते हैं l ऐसा कर हम दुनिया में केवल साम्प्रदायिक सद्भावना के ही नहीं, बल्कि मानवता के भी दुश्मन बन जाते हैं l 

हमारे जीवन में गुरु का महत्व है भी है, और है भी नहीं l महत्व क्यों है ? गुरु हम मनुष्य के जीवन में दीये के समान है जिनकी सहायता से हम अज्ञानता के अन्धकार को चीरते हुए, हम अपने अंतर्मन के प्रकाशपुंज को ख़ोज सकते हैं l महत्व क्यों कम हो जाता है ? हमारे जीवन में गुरु के महत्व पर सवालिया निशान लगना तब शुरू हो जाता है, जब हम जिंदगी भर दीये को हाथ में लिए फिरते रहते हैं, शायद यह सोच कर कि संसार में अज्ञानता के अन्धकार को मिटा देंगें l स्वयं दीया नहीं बनना चाहते l दीया हाथ में लिए हम सत्य की खोज की यात्रा बाहर (संसार) में करते रहते है, और अपने अंतर्मन के प्रकाश को कभी नही ढूँढना चाहते, कभी स्वयं दीपक नहीं बनना चाहते l इसका मतलब कदापि यह नहीं कि दीये (गुरु) को फैंक ही दिया जाए l पर दीये को हाथ में लिए फिरना भी कहाँ की अक्लमंदी है? दीये की जगह हमारे हाथ नहीं, हमारा दिल होना चाहिए l यदि किसी दीये ने हमारे अंतःकरण के दीये को जला दिया है, तो यह स्वाभाविक है कि हम कहीं भी रहे, प्रकाश स्वतः ही हमारे चारों ओर फ़ैल जायेगा l 
    
आज के युग में धर्म और अध्यात्म में विश्वास रखने वाले लोग यदि अपने-२ दीये को हाथ में लिए घूमने की बजाय स्वयं दीये बनें, संसार में दिये न बेचें,  बल्कि प्रकाश बांटें (स्वयं जलकर), तो वे इस धरती को, इस धरती पर जीवन को बेहतर बनाने में अपनी अहम भूमिका निभा सकते हैं l 

प्रिय मित्र राजू, मेरे उद्गार के प्रति अपनी सहमित व असहमति अवश्य दर्ज़ करना l हमें भी अपनी बौधिक क्षमता को पैनी करने में शायद कुछ मदद मिलें l

हाँ, तुम्हारी याद तब ज्यादा आती है, जब अकेला लगभग हर ऱोज प्रकृति माँ की सेवा (सफाई) करने निकलता हूँ l मनुष्य स्वार्थ का पुतला है l मैं कोई अपवाद नहीं हूँ , मैं भी तो एक मनुष्य ही हूँ l आह, हम दोनों दोस्त, दुनिया की परवाह किये बगैर, खूब मिलकर “शिक्षा-क्रांति” (ngo) के सोलन शहर में दो साल से निरंतर चलते आ रहे स्वच्छता अभियान (“एक रुपया दान, स्वच्छता अभियान”) की सुबह-२ क्या खूब कसरत किया करते थे l  पिछले कल मैंने अपने इंस्टिट्यूट के समीप अपने छोटू राम भाई के खोपचे के चारों ओर सोचो कितने घंटे सफाई करी होगी ? पूरे पांच घंटे l नया दरात था, नया दोशंगा. नया जोश, और नया अकेलापनl l जब हम दो होते थे तो, कितना मन मुटाव होता था, मैं कहता था, ये करना है, तुम कहते थे, ये नहीं करना l अब मैं तुम्हारी दखलंदाजी से मुक्त हो गया l मैं अकेला होते हुए भी, अकेलापन कम ही महसूस करता हूँ l शायद, धीरे-२ मैं जीवन की राहों में अकेला चलना सीख रहा हूँ ! 

मेरे जीवन ने मुझे सिखाया है कि यदि मनुष्य अपने जीवन की राहों में अकेला चलना सीख ले, तो वह कभी भी अकेलेपन का शिकार नहीं हो सकता l स्वतन्त्रता उसके साथ चलने के लिए हमेशा तैयार रहती है, सत्य उसका मार्ग दर्शन करता है, आत्मविश्वास और आस्था उसके जीवन-मार्ग के दिशा-सूचक बन जाते हैं l साहस और उत्साह (मानव व प्रकृति सेवा की राह पर चलने का साहस तथा निराशा से आशा की ओर ले जाने वाला उत्साह) उसके परम मित्र बन जाते हैं l ज्ञानीजन इस अकेले चलने की कला को “स्वज्ञान” कहते है l यही ‘स्वज्ञान’ ज्ञान का सबसे ऊँचा सौपान भी है l स्वयं को जानना और खोजना मनुष्य जीवन का परम लक्ष्य है l
  
दोस्त, मुझे पूर्ण विश्वास है कि तुम अपने आत्म-गौरव की रक्षा करते हुए, अपने जीवन मार्ग पर स्वयं की ख़ोज में इसी तरह चलते रहोगे l चलना जीवन है l रुकना मौत l चरैवेति l चरैवेति l

“नदीयाँ चले, चले रे धारा ; चंदा चले, चले रे तारा l
तुझको चलना होगा, तुझको चलना होगा l
जीवन कही भी ठहरता नहीं है;
आंधी से, तूफां से डरता नहीं है l
तू न चलेगा, तो चलें तेरी राहें,
मंजिल को तरसेगी तेरी निगाहें l
तुझको चलना होगा, तुझको चलना होगा l”

स्वतंत्र रहना l स्वतंत्र जीना l स्वतंत्र मरना l जीवन के किसी भी स्टेशन में रहो, पुस्तकें पढ़ने की आदत को छोड़ न देना, इससे तुम्हें स्वयं को समझने में बहुत मदद मिलेगी, तुम्हारी अपनी मौलिक सोच विकसित होगी l अपने जीवन को तुम, दुनिया के चश्मों से नहीं, अपनी नजरों से देखना शुरू कर दोगे l हाँ, मानव और प्रकृति की सेवा यथा सम्भव करते रहना l परम आनंद प्राप्त होगा l जो मनुष्य अपनी निःस्वार्थ भाव से परमार्थ के रास्ते पर चलते हैं, वे इस संसार में मानवता के सच्चे सेवक बन कर, आनंदमय जीवन जीते हैं l जो लोग हमेशा अपने जीवन में सिद्धांत को स्वार्थ से ऊपर रखते है, वे संसार में महान और चरित्रवान कहलाते है l 
मुझे पूर्ण विश्वास है कि मेरे सभी युवा मित्र अपने जीवन में कभी भी स्वार्थ के लिए सिद्धांत से समझौता नहीं करेंगें l ईश्वर सभी का भला करें l  
तुम्हारा दोस्त
सत्यन      

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